क्या नरेन्द्र मोदी को भाजपा के मठाधीश कुछ अच्छा करने देंगे?

यद्यपि आडवानी जी स्वयं एक स्टेट्स-मैन रहे हैं जिनमें किसी समय करिश्मा भी था, फिर भी आज उनके साथ जो हो रहा है उस स्थिति को लाने में उनका भी हाथ है। आडवानी जी के भाषणों में दम होता था। वे हमेशा कड़वा से कड़वा लगे, मगर सच ही बोलते थे। उन्होंने हमेशा अच्छे लोगों की ही संगति की। किसी तरह के आर्थिक घोटाले में भी उनके नाम की कभी चरचा भी नहीं आयी।

मगर क्या हुआ, क्या वज़ह थी की भाजपा 2004 का चुनाव हार गयी, उन स्थितियों में जबकि प्रधान-मंत्री पद पार्टी के जीतने पर उन्हीं को मिलता?

लोग कह्ते हैं और मेरा व्यक्तिगत मत भी यही है कि इंडिया शाइनिंग के ताबड़-तोड़ बंबार्ड्मेंट ने लोगों को उकछा दिया था। फ़ील-गुड की अत्यधिक चर्चा भाजपा के मुंह से ही बार बार होना भाजपा के लिए घातक रहा। यह कुछ वैसा ही था जैसा की राजीव गान्धी के समय में मेरा भारत महान इत्यादि करके जनता को उकछा दिया था। मिले सुर मेरा तुम्हारा का गाना इतनी बार दिन भर में बजता था कि एक अच्छे संजीत को सुन कर भी चिढ होने लगी थी।

उस चुनाव की हार उन्हीं की हार थी क्योंकि प्रधान-मंत्री पद के भाजपा के घोषित उम्मीदवार वही थे। 2009 के चुनाव के समय उन्होंने न पराक्रम का प्रदर्शन किया और न ही पौरुष का। उनके सभी सहयोगी मलई खाने के इच्छुक भर थे, मिहनत किसी ने नहीं की थी उस चुनाव में। अमित शाह कि तरह का कोई कर्तव्य के प्रति समर्पित सहयोगी उनके पास नहीं था। राजनाथ पर चुनावों का दरोमदार छोड कर सभी ऐय्याश सहयोगी अपने शपथ ग्रहण के दिन के इंतज़ार में लगे थे। माहौल पूरी तरह से अनुकूल होने पर भी चुनाव कैसे हारा जा सकता है इस बात की ट्रेनिंग इन नेताओं से ली जा सकती है।

 

राजनाथ के अति-जाति-वाद ने भाजपा के यूपी के ब्राह्मण-बनिया मतदाताओं को दूर कर दिया था। मैंने उस दौर में आड्वाणी जी से चर्चा की थी कि पिछड़ी जातियों के अति-तुष्टिकरण की नीति से ही यूपी में भाजपा चौथे स्थान पर आ गयी है, और हमें अपनी कास्ट-पौलिसी को बदलना पड़ेगा। तब आडवानी जी इस बात से थोड़ा भी प्रभावित नज़र नहीं आये और उन्होनें कहा था “इस विन्दु पर मैं बातचीत नहीं करता हूं। आप राजनाथ जी से मिल कर अपनी बात कह सकते हैं।” ध्यान देने की बात यह है कि उस समय जाट भी अगड़े में आते थे और जाट, ब्राह्मण, बनिया, भूमिहार-त्यागी और राजपूत को मिला कर करीब करीब चालीस प्रतिशत वोट हो जाते थे, जो जीतने के लिये काफ़ी होते थे। नरेन्द्र जी ने जाति के आधार पर वोट न मांग कर अगड़ों को यह मेसेज दिया कि आप डरें नहीं। आप के जीवित रहने के अधिकार को हम अन्य नेताओं कि तरह क्षतिग्रस्त नहीं होने देंगे। तीस वर्षों में यह पहला चुनाव है, जिसमें प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार ने पिछड़ा, दलित और मुस्लिम तुष्केटिकरण के जुमलों का इस्तेमाल किये विना चुनाव लड़ा है। और यही इनकी जीत का कारण है।

 

किन्तु सिर्फ़ प्रधान मंत्री बनने से वे देश का विकास नहीं करवा पायेंगे। उनको पुरानी टीम के सभी (राजनाथ सहित) को दर किनार करके बिलकुल नये लोगों की टीम को लाना होगा। आडवानी जी को स्पीकर का पद दिया जा सकता है। सुषमा स्वराज को कामराज प्लान के तहत किसी सेवा प्रकल्प के विकास की जिम्मेदारी दी जा सकती है। जेटली हार ही चुके हैं। राजनाथ को कोई मन्त्री पद दे कर पार्टी अध्यक्ष पद से हटाना पड़ेगा। पार्टी अध्यक्ष का पद अमित शाह को मिलना चाहिये। पुराने लोगों में सिर्फ़ रविशंकर प्रसाद को मन्त्री बनाने की ज़रूरत है। रूड़ी, यसवंत सिंहा, शत्रुघ्न सिंहा,  वगैरह को भूलना होगा।  नये लोगों में अश्विनी चौबेय जैसे जुझारु एवं समर्पित लोगों को लेना आवश्यक है। अरुण शूरी, जनरल वीके सिंह, केपीएस गिल इतादि को लिया जाना चाहिये।

 

अगर नरेन्द्र जी ने यह सब नहीं किया, और पुराने लोगों को ही मन्त्री बनाया तो वे कुछ भी नया और कुछभी नये ढंग से नहीं कर पायेंगे।

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One thought on “क्या नरेन्द्र मोदी को भाजपा के मठाधीश कुछ अच्छा करने देंगे?

  1. Largely right. BJP should bring in new blood at all levels and new thought. I am sure Modiji can and will do that.

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